"Hold on to your dreams, do not let them die, we are lame without them, birds that can not fly..." Ruskin Bond
Sunday, February 3, 2019
Wednesday, January 30, 2019
Thursday, January 24, 2019
Wednesday, January 23, 2019
ये रास्ते..
Sunday, January 13, 2019
Saturday, November 25, 2017
मैं क्या कर रहा हूँ......
कभी कभी मेरे मन मे ख्याल आता है,
दुनिया मे कितने प्रतिभाशाली लोग है,
जो दिन रात मेहनत करते है, सफल होने के लिए,
और फिर मैं खुद की तुलना उनसे करने लगता हूं।
सोचता हूं, "सफल होने के लिए",
"अपना नाम रोशन करने के लिए",
"लोग क्या क्या नही करते!",
"और एक मैं क्या कर रहा हुं"?
क्या कर रहा हूँ?
मैं क्या कर रहा हूँ?
कुछ नही कर रहा,
बस वक़्त काट रहा हूँ।
जिंदगी मेरी एक प्रयोगशाला है,
और मैं उसका अकेला वैज्ञानिक,
मेरी ही थ्योरी है, मैं ही उसका प्रमाण हूँ,
मैं ही उसको सिद्ध करता, मैं ही नकारता हूँ।
जाने क्या मुझे सिद्ध करना है?
जाने क्या और किसे दिखाना है?
एक भटका हुआ मुसाफिर हूँ,
या फिर कोई दिले नादान हूँ?
जितेंद्र
Monday, November 6, 2017
दो जिंदगी.....
अब दो जिंदगियां,
जीने की सोचता हूं,
एक अपने लिए,
एक तुम्हारे लिए।
तुम्हारी भावनाये समझूं,
उसका सम्मान करू,
अपनी भावनाएं,
अपने तक रखूं, तुमसे न कहूं।
मैं तो सक्षम हूं,
तुम्हारी भावनाये समझ लूंगा,
पर शायद अभी तुम,
मेरी भावनाये न समझ सको।
कोशिश की थी,
पर मैं गलत था,
तुमसे उम्मीद लगा ली,
कि तुम मुझे समझोगी।
आगे से अब नही कहूंगा,
तुमसे अपने मन की बाते,
अपने विचार, अपनी इच्छाएं,
प्यार वाली गाली, अपनी दुविधाएं।
तुम मेरे हमसफर हो,
ये बात तुम्हे याद हो न हो,
मैं याद रखूंगा आगे से,
हर वक़्त, हर पल, प्रतिक्षण।
जो कहोगी, करूँगा।
जैसे कहोगी, रहूंगा।
तुम मेरे खांचे में मत ढलो,
मैं तुम्हारे खांचे में ढल जाऊंगा।
जी लूंगा एक और जिंदगी,
तुम्हारे लिए, ताकि तुम खुश रहो।
खुद को मैं संभाल लूंगा,
इतना सक्षम हूं मैं, इतना समर्थ हूं मैं।
इस तरह शायद,
मैं तुम्हे पा लूंगा।
पर शायद तुम,
मुझे कभी न पा सको।
जितेंद्र
Saturday, October 28, 2017
बुलबुले
विचारो के बुलबुले,
बनते रहते है,
मन के किसी कोने में,
अनजाने ही, अनचाहे ही।
सोचता हूं,
कुछ को कैद कर लूं,
पर हाथ लगाते ही,
बुलबुले फूट जाते है।
जानता हूं इनकी तकदीर,
ये बनते है, फूटने के लिए,
पर मेरी भी ये जिद है इन्हें,
अपना बनाना है एक दिन।
जितेंद्र
Friday, September 29, 2017
तलाश
भटकता रहता हूँ,
लेकर अपना तन को,
ताकि मिल सके सुकून,
मेरे इस मन को।
तलाश जारी रहती है,
ना जाने किस सुकून की,
दिन-रात, सुबह -शाम,
यहां -वहां, इधर-उधर।
भटकाव खत्म नही होता,
इच्छाएं कभी नही मरती,
अभिलाषा जिंदा रहती है,
मरता हूँ तो सिर्फ मैं।
पल-प्रतिपल, क्षण-प्रतिक्षण,
कभी न बुझने वाली आग,
दिल मे जलाये रखता हूँ, या
खुद जलता रहता हूं।
जितेंद्र
Friday, August 4, 2017
वो
उसके रहने से, घर मे खुशी रहती है,
वो नही होती तो घर मे वीरानी आ जाती है।
उसके होने का अहसास ही बहुत है मेरे लिए,
न होने के बारे में मैं सोच भी नही सकता।
आफिस में रहूँ, या कही सफर में रहूँ,
वो हर वक़्त मेरे साथ होती है।
हर वक़्त, हर पल उसकी मुस्कान साथ होती है,
वो नही होती, तो भी वो मेरे साथ होती है।
वो जो मेरी हमसफ़र है, कह नही पाता,
उससे कुछ भी, क्यों कि वो तो मैं ही हूँ।
वो जो मेरा आधा हिस्सा है, उसमे भी मैं ही हूँ,
अपेक्षा करता हूँ, वो सब जान जाएगी खुद से ही।
बिना कुछ कहे, बिना कुछ बताये, उसको,
एक दिन मुझको, पहचान जाएगी खुद से ही।
जितेन्द्र
मैं
बंज़र नही हूँ मैं
मुझमे बहुत सी नमी है,
दर्द बयां नही करता,
बस इतनी सी कमी है।
Saturday, July 29, 2017
मैं और बाघ
पास ही में जंगल है,
वहां आज भी बाघ रहते है,
वहां आज भी तेंदुए रहते है।
की छत पर बाघ आ जायेगा,
पहले मैं डरूंगा,
फिर वो मुझे खा जाएगा।
बाघ उतना खतरनाक नही,
जितना मैं स्वयं हुँ,
अपनी पत्नी के लिए।
"बाघ से डर नही लगता जी,
आप से लगता है!"
मैने पूछा क्यों?
पर आप तो मुझे हर रोज़,
तिनका तिनका मारते है,
तड़पाते है, रुलाते है।" उसने कहा!
Friday, July 28, 2017
असमंजस
कुछ ख्वाहिशें,
जो पूरी होने को है,
कुछ ख्वाहिशें,
जो पूरी करने को है।
कुछ काम,
जो आज ही करने है,
कुछ काम,
जो आगे करने को है।
कुछ सपने,
जो पूरे हो चुके है,
कुछ सपने,
जो पूरे करने को है।
अतीत, भविष्य,
और वर्तमान,
में उलझी
मेरी जान।
आज की उलझन,
आज की भागदौड़,
कल क्या है करना,
नही है कोई सोच।
सोचता हूं, आज करूँगा!
सोचता हूं, कल करूँगा!
और ये भी की, ये करूँगा!
और, वो करूँगा!
पर न आज आता है,
न कल आता है,
न ये करता हूँ,
न ही वो करता हूँ।
हर एक दिन आता है,
और गुज़र जाता है,
फिर अगला दिन आता है,
और वो भी गुज़र जाता है।
पर मैं उदासीन रहता हूं,
किसी से कुछ नही कहता हूं,
शायद उदास रहता हूं?
या नही भी रहता हूँ?
शायद मैं खुद को नही पहचानता?
अपने से बात करता तो हूं रोज़,
पर अपने आप को ही नही जानता?
या जानना ही नही चाहता?
मुझे नही पता,
मुझे क्या करना है?
जिसने जो कहा,
क्या वो ही बनना है?
मैं निर्णय नही लेता,
असमंजस में रहता हूं,
शायद यही मैं हूँ,
शायद यही मेरी पहचान है।
शायद मुझे कुछ नही करना,
मुझे कुछ नही बनना,
शायद यही मेरी नियति है,
शायद यही मेरा भाग्य है।
जितेंद्र
कुछ भी..
रोज़ सुबह होती है,
रोज़ शाम होती है,
हर एक दिन
ऐसे ही तमाम होती है।
दिन अब केवल
गिनती को रह गए है,
बस आये
और चले गए है।
न कोई आशा,
न ही अभिलाषा,
मन मे शून्य,
और दिल मे निराशा।
जितेंद्र
Friday, July 7, 2017
मंज़िले और रास्ते
बस मंज़िल का पता रखते हैं,
रास्ते की फिक्र नही मुझको,
साधन कौन सा होगा, नही पता,
बस हौसले को जिंदा रखते हैं।
Saturday, July 1, 2017
जिंदगी
अपनी जिंदगी से मैं ऊब गया लगता हूँ,
ना जाने किस बात की कसक बाकी है,
Tuesday, July 19, 2016
Sunday, February 23, 2014
हवा
Thursday, September 5, 2013
'कातिल'
Monday, August 19, 2013
"उनकी फितरत, मेरी आदत"
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| Image Courtesy: Vinayak Gupta |












