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Sunday, February 3, 2019

इंतज़ार..

बस पत्ते ही झड़े है,
जड़ो से नही सूखा हूँ,
ये मौसम की बेरुखी है,
जो ऐसा हो गया हूँ..

मेरा भी मौसम आएगा,
जब सूरज धरा तपायेगा,
बारिश की बूंदे बरसेंगी,
जब नभ काला हो जाएगा..

उस दिन के इंतज़ार में हूँ,
उस दिन ही पत्ते निकलेंगे,
अभी तो जड़ें गहरा रहा हूँ,
शायद खुद को तलाश रहा हूँ..

जितेंद्र..

Wednesday, January 30, 2019

Nostalgia...


यादों के अरण्य में,
भटकते है हम,
जिन्हें खोजते है,
और सोचते है हम..

कहीं छाया दिखती है
कहीं भ्रम होता है,
उनकी आहट मिलती है,
और खो जाते है हम..

यही वो मिला था,
वहां वो हंसा था,
कहाँ वो जुदा था,
सोचते है हम..

पर उन जगहों पर,
वो नही मिलते,
मिलते है तो बस,
उनकी यादों से हम..

जितेंद्र...



Thursday, January 24, 2019

वजूद..


तुम्हे खोजता हूँ,
या खुद को,
तुम एक बहाना हो,
कह दो मुझको..

वजूद मेरा है,
या अस्तित्व तुम्हारा,
तुम एक फ़साना हो,
लगा जैसे मुझको..

मेरी कोई ख्वाहिश,
या तुम्हारी तलाश,
तुम! सच मे तुम हो?
लगता नही मुझको...

जितेंद्र..


Wednesday, January 23, 2019

ये रास्ते..


ये रास्ते,
जो कही जा रहे है,
इन्हें मेरी जरूरत नही है,
मुझे इनकी जरूरत है।

ये रास्ते,
ये कही तो जाते होंगे,
मुझको न सही, पर किसी न किसी को-
मंज़िल तक तो पहुंचाते होंगे।

ये रास्ते,
जो सदियो से यही थे,
आज इन पर मैं चल रहा हूँ,
कल कोई और था, कल कोई और होगा।

ये रास्ते,
ये सही या गलत नही होते,
ये अपने या पराये होते है,
ये किसी के दिखाए या किसी के आजमाए होते है।

ये रास्ते..... ये बस होते है...


Sunday, January 13, 2019

अहं ब्रह्मास्मि...

अम्बर,
अम्बर में दिनकर,
दिनकर तले पर्वत,
पर्वत तले सरोवर,
सरोवर से लगी धरती,
धरती पे उगी झाड़ी,
झाड़ी में छिपा अक्स,
अक्स में छिपी इच्छा,
इच्छा में मैं,
मुझमे ये ब्रह्मांड,
ब्रह्मांड में सारा जहान..

जितेंद्र..

Saturday, November 25, 2017

मैं क्या कर रहा हूँ......

कभी कभी मेरे मन मे ख्याल आता है,
दुनिया मे कितने प्रतिभाशाली लोग है,
जो दिन रात मेहनत करते है, सफल होने के लिए,
और फिर मैं खुद की तुलना उनसे करने लगता हूं।

सोचता हूं, "सफल होने के लिए",
"अपना नाम रोशन करने के लिए",
"लोग क्या क्या नही करते!",
"और एक मैं क्या कर रहा हुं"?

क्या कर रहा हूँ?
मैं क्या कर रहा हूँ?
कुछ नही कर रहा,
बस वक़्त काट रहा हूँ।

जिंदगी मेरी एक प्रयोगशाला है,
और मैं उसका अकेला वैज्ञानिक,
मेरी ही थ्योरी है, मैं ही उसका प्रमाण हूँ,
मैं ही उसको सिद्ध करता, मैं ही नकारता हूँ।

जाने क्या मुझे सिद्ध करना है?
जाने क्या और किसे दिखाना है?
एक भटका हुआ मुसाफिर हूँ,
या फिर कोई दिले नादान हूँ?

जितेंद्र

Monday, November 6, 2017

दो जिंदगी.....

अब दो जिंदगियां,
जीने की सोचता हूं,
एक अपने लिए,
एक तुम्हारे लिए।

तुम्हारी भावनाये समझूं,
उसका सम्मान करू,
अपनी भावनाएं,
अपने तक रखूं, तुमसे न कहूं।

मैं तो सक्षम हूं,
तुम्हारी भावनाये समझ लूंगा,
पर शायद अभी तुम,
मेरी भावनाये न समझ सको।

कोशिश की थी,
पर मैं गलत था,
तुमसे उम्मीद लगा ली,
कि तुम मुझे समझोगी।

आगे से अब नही कहूंगा,
तुमसे अपने मन की बाते,
अपने विचार, अपनी इच्छाएं,
प्यार वाली गाली, अपनी दुविधाएं।

तुम मेरे हमसफर हो,
ये बात तुम्हे याद हो न हो,
मैं याद रखूंगा आगे से,
हर वक़्त, हर पल, प्रतिक्षण।

जो कहोगी, करूँगा।
जैसे कहोगी, रहूंगा।
तुम मेरे खांचे में मत ढलो,
मैं तुम्हारे खांचे में ढल जाऊंगा।

जी लूंगा एक और जिंदगी,
तुम्हारे लिए, ताकि तुम खुश रहो।
खुद को मैं संभाल लूंगा,
इतना सक्षम हूं मैं, इतना समर्थ हूं मैं।

इस तरह शायद,
मैं तुम्हे पा लूंगा।
पर शायद तुम,
मुझे कभी पा सको।

जितेंद्र

Saturday, October 28, 2017

बुलबुले

विचारो के बुलबुले,
बनते रहते है,
मन के किसी कोने में,
अनजाने ही, अनचाहे ही।

सोचता हूं,
कुछ को कैद कर लूं,
पर हाथ लगाते ही,
बुलबुले फूट जाते है।

जानता हूं इनकी तकदीर,
ये बनते है, फूटने के लिए,
पर मेरी भी ये जिद है इन्हें,
अपना बनाना है एक दिन।

जितेंद्र

Friday, September 29, 2017

तलाश

भटकता रहता हूँ,
लेकर अपना तन को,
ताकि मिल सके सुकून,
मेरे इस मन को।

तलाश जारी रहती है,
ना जाने किस सुकून की,
दिन-रात, सुबह -शाम,
यहां -वहां, इधर-उधर।

भटकाव खत्म नही होता,
इच्छाएं कभी नही मरती,
अभिलाषा जिंदा रहती है,
मरता हूँ तो सिर्फ मैं।

पल-प्रतिपल, क्षण-प्रतिक्षण,
कभी न बुझने वाली आग,
दिल मे जलाये रखता हूँ, या
खुद जलता रहता हूं।
जितेंद्र

Friday, August 4, 2017

वो

उसके रहने से, घर मे खुशी रहती है,
वो नही होती तो घर मे वीरानी आ जाती है।

उसके होने का अहसास ही बहुत है मेरे लिए,
न होने के बारे में मैं सोच भी नही सकता।

आफिस में रहूँ, या कही सफर में रहूँ,
वो हर वक़्त मेरे साथ होती है।

हर वक़्त, हर पल उसकी मुस्कान साथ होती है,
वो नही होती, तो भी वो मेरे साथ होती है।

वो जो मेरी हमसफ़र है, कह नही पाता,
उससे कुछ भी, क्यों कि वो तो मैं ही हूँ।

वो जो मेरा आधा हिस्सा है, उसमे भी मैं ही हूँ,
अपेक्षा करता हूँ, वो सब जान जाएगी खुद से ही।

बिना कुछ कहे, बिना कुछ बताये, उसको,
एक दिन मुझको, पहचान जाएगी खुद से ही।

जितेन्द्र

मैं

बंज़र नही हूँ मैं
मुझमे बहुत सी नमी है,
दर्द बयां नही करता,
बस इतनी सी कमी है।

Saturday, July 29, 2017

मैं और बाघ

जहा मैं रहता हूं,
पास ही में जंगल है,
वहां आज भी बाघ रहते है,
वहां आज भी तेंदुए रहते है।
कभी कभी लगता है,
की छत पर बाघ आ जायेगा,
पहले मैं डरूंगा,
फिर वो मुझे खा जाएगा।
पर शायद ये मेरे मन का वहम है,
बाघ उतना खतरनाक नही,
जितना मैं स्वयं हुँ,
अपनी पत्नी के लिए।
वो कहती है, मुझसे,
"बाघ से डर नही लगता जी,
आप से लगता है!"
मैने पूछा क्यों?
"बाघ तो एक ही बार मे मार खायेगा,
पर आप तो मुझे हर रोज़,
तिनका तिनका मारते है,
तड़पाते है, रुलाते है।" उसने कहा!
जितेंद्र

Friday, July 28, 2017

असमंजस

कुछ ख्वाहिशें,
जो पूरी होने को है,
कुछ ख्वाहिशें,
जो पूरी करने को है।

कुछ काम,
जो आज ही करने है,
कुछ काम,
जो आगे करने को है।

कुछ सपने,
जो पूरे हो चुके है,
कुछ सपने,
जो पूरे करने को है।

अतीत, भविष्य,
और वर्तमान,
में उलझी
मेरी जान।

आज की उलझन,
आज की भागदौड़,
कल क्या है करना,
नही है कोई सोच।

सोचता हूं, आज करूँगा!
सोचता हूं, कल करूँगा!
और ये भी की, ये करूँगा!
और, वो करूँगा!

पर न आज आता है,
न कल आता है,
न ये करता हूँ,
न ही वो करता हूँ।

हर एक दिन आता है,
और गुज़र जाता है,
फिर अगला दिन आता है,
और वो भी गुज़र जाता है।

पर मैं उदासीन रहता हूं,
किसी से कुछ नही कहता हूं,
शायद उदास रहता हूं?
या नही भी रहता हूँ?

शायद मैं खुद को नही पहचानता?
अपने से बात करता तो हूं रोज़,
पर अपने आप को ही नही जानता?
या जानना ही नही चाहता?

मुझे नही पता,
मुझे क्या करना है?
जिसने जो कहा,
क्या वो ही बनना है?

मैं निर्णय नही लेता,
असमंजस में रहता हूं,
शायद यही मैं हूँ,
शायद यही मेरी पहचान है।

शायद मुझे कुछ नही करना,
मुझे कुछ नही बनना,
शायद यही मेरी नियति है,
शायद यही मेरा भाग्य है।

जितेंद्र



कुछ भी..

रोज़ सुबह होती है,
रोज़ शाम होती है,
हर एक दिन
ऐसे ही तमाम होती है।

दिन अब केवल
गिनती को रह गए है,
बस आये
और चले गए है।

न कोई आशा,
न ही अभिलाषा,
मन मे शून्य,
और दिल मे निराशा।

जितेंद्र

Friday, July 7, 2017

मंज़िले और रास्ते

बस मंज़िल का पता रखते हैं,
रास्ते की फिक्र नही मुझको,
साधन कौन सा होगा, नही पता,
बस हौसले को जिंदा रखते हैं।

Saturday, July 1, 2017

जिंदगी

अपनी जिंदगी से मैं ऊब गया लगता हूँ,
ना जाने किस बात की कसक बाकी है,

Sunday, February 23, 2014

हवा

फिर याद आयी वह जमीं ;
फिर याद आया वह जहाँ ;
जो है यहाँ से दूर, फिर भी ,
दिल है करता जा वहाँ। 

फिर याद आयी वही धूप ;
फिर याद आयी वह हवा ;
जो आ रही है यहाँ तक ,
पैगाम लेकर जा वहाँ। 

पर भ्रम जो टूटा ;
खुद से पूछा- 
"यह बता-
तू है कहाँ?"

आवाज आयी-
मन ही मन;
ये भ्रम है तेरा 
कुछ बड़ा। 

"कर्त्तव्य पथ पर,
चल ओ राही! 
सोच मत-
तू है कहाँ?"

"तू रह यहाँ, या रह वहाँ ;
तू रह यहाँ चाहे जहाँ ;
निज प्राण तो यह भूमि है;
आकाश तेरा तन यहाँ। "

जितेन्द्र गुप्ता 

Thursday, September 5, 2013

'कातिल'

वो एक नन्हा सा कीड़ा था,
जिसे अभी मैंने मसल दिया.
सोचता हूँ, कि "क्या इसका भी-
भविष्य उसी ईश्वर ने लिखा था."

यह एक संयोग था, या 
पूर्व निश्चित था कि,
उसे मेरे हाथों मरना है?
और मैं एक कातिल हूँ.

क्या ईश्वर इतना खाली है, कि-
"हर जीव का भाग्य लिखता है?"
या यह सिर्फ मेरा वहम है,
और ईश्वर कही नहीं है.

पता नहीं की, वो है या नहीं है?
और भाग्य लिखता भी है या नहीं?
पर ये सच है की मैंने उसे मारा है,
और मैं कुछ और को ढूंढ रहा हूँ.

जितेन्द्र गुप्ता 

Monday, August 19, 2013

"उनकी फितरत, मेरी आदत"

सोचता हूँ की सोचने से क्या होगा?
लेकिन फिर भी कुछ देर सोचता हूँ.
मेरी ख़ामोशी के क्या निहितार्थ है?
यह उन्हें कौन और कैसे बता देता है?

जब उनकी नज़रें मुझसे उलझती है,
मैं कुछ नहीं कहता, बस उन्हें पढता हूँ.
बिना ये जाने, बिना ये समझे कि-
नयनों की भाषा मुझे समझ नहीं आती.

मैं कुछ-कुछ अनुमान लगाता हूँ, 
शायद, वो मुझसे बेहद नाराज़ है.
पर हम दोनों गुमसुम ही रह जाते है,
कोई किसी से कुछ नहीं कहता.

अगर नाराज़ होना उनकी फितरत है,
तो खामोश रहना मेरी आदत.
मैं खुद को बदल नहीं पाता,
और वो मुझे बर्दाश्त नहीं कर पाते.

शायद यही वजह है, की हम अलग है.
हमारी मंजिलें अलग है, और रास्ते भी अलग.
और हम साथ बस उसी दोराहे तक थे,
जहाँ से हम हुए थे, एक-दुसरे से अलग.

जितेन्द्र गुप्ता
Image Courtesy: Vinayak Gupta