सवाल कई है, जो उमड़ घुमड़ कर मेरे चिन्तनलोक में मंडरा रहा है। पर सबसे ज्यादा वो एक प्रश्न, जिसपे मैं विचारोत्तेजित हूँ, वो ये है कि, मैं क्या करूँ? मैं क्या कर सकता हूँ? क्या मैं कुछ कर पाऊंगा? कहानी कुछ इस तरह से है कि पिता जी ने कॉलेज खोलने के लिए जिस ट्रस्ट का पंजीकरण करवाया था, उसपर आयकर की नोटिस आयी। जवाब देने के लिए जब पिता जी लखनऊ गए, तो अधिकारी ने उनसे डेढ़ लाख की मांग की। पिता जी पचास हजार देने को तैयार थे, पर वो नही माना, उन्हें ट्रस्ट का पंजीकरण निरस्त कर दिया। अब मामला अधिकरण में गया है। मुझे दुराशा ही नही नही अपितु पूरा यकीन है कि अधिकरण में दो या तीन लाख से नीचे की मांग तो नही ही होगी। उस अधिकारी के पास पिताजी केवल चार्टर्ड अकाउंटेंट के साथ ही नही गए थे, बल्कि कई उसी पद पर रह चुके भूतपूर्व अधिकारियों का रिफरेन्स ले के गए थे। लेकिन उसे पैसे चाहिए थे तो बस चाहिए थे। उसने अपने पद की शक्ति का भरपूर प्रयोग किया और अब ज्यादा दिए बिना बात ही नही बनेगी। कहानी अभी जारी रहेगी, लेकिन यक्ष प्रश्न वही रहेगा, मैं क्या करूँ? मैं क्या कर सकता हूँ? क्या मैं कुछ कर पाऊंगा?
अपने कार्यालय में
अभी पिछले हफ्ते मैने एक फ़िल्म देखी थी। मैट्रिक्स!
"Hold on to your dreams, do not let them die, we are lame without them, birds that can not fly..." Ruskin Bond
Sunday, January 7, 2018
कशमकश (भाग 2)
Saturday, December 16, 2017
इन दिनों...
हम शायद इस दुनिया मे कुछ कड़वे अनुभव लेने के लिए ही आते है। कौन जानता है कि ये दुनिया सत्य है या मिथ्या है? लगता है जैसे जब मौत होगी तो नींद से उठूंगा, और इस दुनिया के मिथ्या रूप का भान होगा। लगता है जैसे ये दुनिया एक सपना है, मौत के बाद ही नींद खुलेगी। गीता के अनुसार हम खाली हाथ आये है, खाली हाथ जाएंगे।
ताल्लुक कौन रखता है किसी नाकाम से लेकिन,
मिले जो कामयाबी सारे रिश्ते बोल पड़ते है,
मेरी खूबी पे रहते है यहाँ अहले जबाँ खामोश,
मेरे ऐबों पे चर्चा हो तो गूंगे बोल पड़ते है।
यूँ तो मुझमे कोई ऐब नही,
बैठ जाता हूँ मिट्टी पे अक्सर,
क्यों कि मुझे मेरी औकात अच्छी लगती है।
सुबह की सैर.....
आजकल बनकटी, पीलीभीत के मार्ग पे सुबह की सैर को जा रहा हूँ। हालांकि ये वही मार्ग है, जिसपे बाघ अक्सर जंगल से निकल आता है, और लोगो पे हमला कर देता है। पर आजतक मेरी बाघ से मुलाकात नही हुई। सुबह जाते वक्त कुछ डर तो लगता है, लेकिन बाघ दिखने की जिज्ञासा भी रहती है। लगता है जिस दिन बाघ से मुलाक़ात होगी, या तो बाघ रहेगा या मैं....
Tuesday, December 12, 2017
कशमकश.....
"हम समझ गए, आपका मन नही है इसलिए हम फ़ोन रखते है", उन्होंने कहा और फ़ोन काट दिया। और मैं जैसे बीच मझधार डूबता उतराता रहा। खुद को ये समझाता रहा, की जब उनके हिसाब से मेरा वो बाते करने का मन होगा, तो ही वो बाते करेगी, नही तो यही कहेंगी, "हम समझ गए, आपका मन नही है, इसलिए हम फ़ोन रखते है"। शायद उन्हें सिर्फ अपने मन का ख्याल आता है, मेरे मन का नही। उन्हें लगता है कि मैं ही उन्हें उत्पीड़ित करने वाला इंसान हूँ, और वो ही केवल रोना जानती है। जब कि सच्चाई ये है कि रोता मैं भी हूँ, बस आंसू नही निकलते। उत्पीड़ित मैं भी होता हूँ, बस आह नही निकलती।
उनका कहना था कि मुझे पढ़ना चाहिए, तैयारी करनी चाहिए। उन सब को मुझसे बहुत उम्मीदें है कि मैं DM या SDM बनूँगा, और फिर हमारे पास रुपया, पैसा, धन, दौलत, गाड़ी, बंगला, इज़्ज़त, शोहरत, नाम और सम्मान सब कुछ होगा। उनकी मुझसे जो उम्मीदे है उसको मैं नाउम्मीद में कैसे तब्दील कर सकता हूँ? बहुत मुश्किल है, और बहुत कष्टदायी भी। वो किसी ऐसे परिचित का उदाहरण दे रहीं थी जो BSA है। बता रहीं थी कि उस BSA ने इतनी दौलत बना ली है कि उसके पास पैसे रखने की जगह नही है। इतनी अकूत दौलत इकट्ठा हो गयी है कि पूरा का पूरा गांव ही उसके पैसे से शराबी बन गया है। उसकी बातें सुनकर मुझमे सो रही पैसे बनाने की क्षुधा फिर से जागृत होने लगी। और शायद अप्रत्यक्ष रूप से वो मुझे भी प्रोत्साहित कर रही थी कि मैं भी उसी BSA जैसा बनू। पर मेरी समझ मे नही आता कि पहले मैं पढू, लिखू, और सरकारी सेवा में जाऊ, तब लूट खसोट कर के दो नंबर का पीटू। इससे अच्छा है कि मैं केवल अर्थसाधना में ही न लग जाऊ? आखिर अंतिम उद्देश्य पैसा ही कमाना है तो पढ़ने की क्या आवश्यकता है? क्यों मैं लक्ष्मी को साधने के लिए सरस्वती को साधन बनाऊ?
इन दिनों अजीब सी कशमकश से गुजर रहा हूँ। सच मे अजीब सी कशमकश से। मुझमे भी दो नंबर का पीटने का शुरूर छा रहा है। पर उसमे नैतिकता आड़े आ रही है। वैसे तो इन दिनों ज्यादा कुछ दो नंबर का मिलता नही,लेकिन जब मिलता है तब नैतिकतावश खुद पे शर्म आती है। जमीर गवाही नही देता की इस तरह मैं वो इकट्ठा करू। पर नैतिकता को एक किनारे रख के मैं पीट ही देता हूँ। लेने के कुछ समय तक मुझे खुद पे शर्म आती है। फिर अच्छा लगने लगता है। पीटने के बाद अच्छी फीलिंग आती है। पर साथ ही एक कसक रह जाती है कि मेरे ही पद पे अन्य जगहों पे रहने वाले लोग मुझसे ज्यादा पीट रहे होंगे। मैं उतना नही कर पा रहा हूँ। और मुझमे और ज्यादा पीटने की भूख लग जाती है। ये सिलसिला चलता रहता है। थमता नही। और मैं इसी कशमकश में डूबता उतराता हूँ। जब कुछ नही मिलता तो खराब लगता है, जब कुछ मिलता है तो भी शर्म आती है, हालांकि मिल जाने के कुछ देर बाद अच्छा लगने लगता है, किन्तु ये खुशी मेरी भूख को बढ़ा देती है। और मुझे फिर से खराब लगने लगता है। कशमकश का ये सिलसिला चलता रहता है, और मैं इसी में डूबता उतराता रहता हूँ। मेरी समझ मे नही आता कि मेरी भूख क्यों बढ़ रही है? मेरे खर्चे तो सीमित है, कोई महंगा शौक भी नही है। तो इतनी भूख क्यों?
आज तक जितना भी मैंने इस जगह पे पीट कर बनाया होगा, सब मैंने घर पे दादी अम्मा को समर्पित कर दिया है। उस राशि से बहुत कम का इस्तेमाल ही मैंने शायद किया होगा। शायद मैं ऐसा इसलिए करता हूँ ताकि घर वालो को ये लगे कि कल तक जो पैसे वो दिया करते थे, अब उनकी लेने की बारी आई है। पर ये अर्धसत्य ही है।
अभी मेरे पिताजी को ही मेरे ही विभाग के एक अधिकारी को एक मोटी सी राशि बतौर सुविधाशुल्क देनी पड़ी ताकि काम हो जाये। उसमे मेरी भी पहचान काम नही आई। जब पिता जी ने मुझे इस बारे में बताया तो मेरा मन घृणा, क्षोभ, क्रोध और शर्म से भर गया। मेरा विश्वास इंसानियत से उठ गया। ये कैसा समाज है जिसका हम हिस्सा है? यहाँ करदाता भी भ्रष्ट, कर अधिकारी भी भ्रष्ट और कर वसूलने वाली सरकारे भी भ्रष्ट। जब सब अपनी अपनी जेबे भरने में लगे हुए है तो जरूरत क्या है इस भ्रष्ट तंत्र की। क्या जरूरत है ऐसे कानून की, जो भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता हो?
इस भ्रष्टतंत्र में आकर मैं भी दोगला हो गया हूं। लेते वक्त मुझे जो भ्रष्टाचार नही दिखता, देते वक्त वो बहुत चुभता है। खलता है। धीरे धीरे मेरा विश्वाश भी इंसानियत से उठ रहा है। अब मुझे सब कुछ पैसा ही दिख रहा है। भले ही मेरी जरूरते सीमित हो, भले ही मुझे कोई महंगा शौक न हो पर सब कुछ शायद पैसा ही है।
मुझे माफ़ कर देना की मैं तुम सब की उम्मीदों को नाउम्मीदी में बदल रहा हूँ। जब तुम्हारी और सब की नज़रों में सब कुछ पैसा ही है तो मैं पैसा ही बनाने पे ध्यान केंद्रित करता हूँ। सरस्वती मेरे लिए मायने नही रखती जब लक्ष्मी जी मेरा लक्ष्य है।
जितेंद्र
Tuesday, November 28, 2017
पहली सालगिरह....
प्यारी पू-र्णि-माँ,
पिछले साल के दिसंबर से इस साल के दिसंबर के बीच हमने एक साल का सफर साथ में तय कर लिया है। इस बीच हमारे तुम्हारे रिश्ते के बीच कई उतार चढ़ाव आये पर तुम्हारे साथ रहना मुझे हमेशा बहुत अच्छा लगता रहा। तुम नही होती हो तो तुम्हारी कमी खलती है। ना जाने कैसे तुम मेरी जिंदगी में आई, चुपके से, और दिल की किसी कोने में अपनी जगह बना गयी। मुझे पता ही नही चला, की कब मुझे तुम्हारी लत लग गयी, कब तुम मेरी जरूरत बन गयी, और कब तुम जरूरत से भी बढ़कर मेरी हमसफर बन गयी।
तुम्हे तो स्मरण ही है की दिसंबर की शुरुआत को हमारी शादी के 1 साल पूरे हो जाएंगे। सच्चे अर्थों में शायद मुझसे शादी करके तुमने मुझपे अहसान किया है। इस बात के लिए मैं तुम्हारा तहेदिल से शुक्रगुजार हूं। मुझे याद है, जब हमारी तुम्हारी पहली बार बात हुई थी, जब मैं तुम्हे देखने गया था, तुम्हारे घर। मैंने तुम्हें देखते ही पसंद कर लिया था। पर तुम्हारे व्यवहार से अनभिज्ञ होने के कारण कुछ सशंकित था। पर तुमसे बात करके मेरी उस शंका का भी निवारण हो गया। उस दिन तुम्हे देख के जब मैं घर लौटा, तो दादी ने मुझसे पूछा था, तुम्हारे बारे में मेरी क्या राय है। मैंने उन्हें बेहिचक बता दिया था की उम्मीद से बेहतर! उम्मीद से ज्यादा! दादी, पापा तो पहले से ही तुम्हारे पक्ष में थे। वो बस मेरी रजामंदी का इंतज़ार कर रहे थे।
मुझे ये भी बाते याद आती है जो कि तुम कभी कभी मुझे बताती थी अपने पिता जी के बारे में। कैसे उनके जाने के बाद तुम अकेली हो गयी थी, शायद अंदर से बहुत टूट चुकी थी। एकाकीपन, सूनापन, निराशा और भविष्य को लेकर अनिश्चितता ने तुम्हे अंदर तक झकझोर दिया था। किस तरह कोई तुम्हारी जिंदगी में रोशनी की किरण बन के आया। मुझे याद है, आज भी याद है।
उस वक़्त तक मैने तुम्हे अपने बारे में हर एक बात भी बता दी थी, मेरे भूत से लेके भविष्य की हर एक बात मैने तुम्हे बताई थी, सिवाय एक बात के और वो ये की तुम खुद मेरी जिंदगी में एक रोशनी की किरण बन के आयी थी। तुम्हे मैने ये बात कभी नही बताई की मेरा शादी के बंधन से विश्वास ही उठ चुका था। मेरे आस पास उन दिनों शादी के ऐसे उदाहरण मौजूद थे, और आज भी है जिनके बारे में जानकर मेरा शादी के रिश्ते से विश्वास ही डगमगा गया था। उस वक़्त तुम्हारे साथ ने मुझमे आत्मविश्वास का संचार किया था। मैं मेरे पिताजी और दादी की जिद के आगे हार गया था। दादी ने तो घर ही छोड़ दिया था। उनका कहना था जब तक मैं तुमसे शादी करने के लिए हाँ नही बोल दूंगा, वो लौट कर घर ही नही आएंगी। आज तुम मेरे साथ हो तो मेरे पिता जी और मेरी दादी की बदौलत। वास्तव में मुझमे समझ की कमी थी। लोगो को पहचानने में अभी मैं कच्चा हूँ।
सच कहूं तो तुम्हे पा कर मैं बहुत खुश हूँ पर तुम्हे हर वक़्त, हर पल मैं ये बात तो नही बता सकता। इसलिए कभी कभी जब गुस्से में मैं तुम्हे कुछ कह देता हूँ, तुम्हे डाँट देता हूं, कही का गुस्सा तुम्हारे पे उड़ेल देता हूँ तो मुझे बहुत पश्चाताप होता है। नाहक ही मैंने तुम्हारा दिल दुखाया। मन अपराधबोध से भर जाता है कि मैंने तुम्हारी कोमल भावनाओ को ठेस पहुंचाई। और बाद में इसके लिए मैं तुमसे माफी भी मांगता हूं। तुम्हे याद होगा, कई बार मैने तुमसे एक ही बाते कही है कि मेरी बातों को हल्के में लिया करो। कई बार समझाया भी की मैं गुस्सा करूँगा ही...बस तुम नाराज़ मत हुआ करो, मैं गुस्सा करना नही छोड़ सकता.. सॉरी! ये आदत नही बदल पाऊंगा, आई मिस यू एंड आई लव यू टू...लेकिन मैं गुस्सा करूँगा! करूँगा! करुँगा! तुम अपने मे परिवर्तन लाओ। मुझसे उम्मीद न रखो। मैं खुद को नही बदल सकता। तुम खुद को बदलो।
तुम मेरी बात मानती तो हो, और कहती भी हो कि ठीक है! पर ठीक है कहने से काम नही चलेगा। कल तुम फिर वही गलती दुहराती हो। फिर आंसू बहाती हो, तनाव लेती हो। तुम्हे पता है कि आजकल तनाव ले कर सोचने की बीमारी बहुत लोगो को है। अब तुम भी इसी जमात में शामिल होने की चेष्टा कर रही हो। मैं नही चाहता कि तुम भी सोचने वाली बीमारी से ग्रसित हो जाओ।
एक बात और, जो कभी कभी मैं गुस्से में आकर तुमसे कह देता हूँ, की तुमने मुझे धोखा दिया। मुझे नही मालूम कि ये कितना सच है कितना झूठ। क्योंकि मैं सुबह से लेकर शाम तक ऐसी बहुत सी बातें कहता हूं जो कि झूठ होती है। या मुझे खुद नही पता होता कि जो कुछ भी मैं बोल रहा हूं वो सच ही है या झूठ। ये सच है कि मैंने हमेशा ये ये चाहा कि मेरा हमसफर कुछ रचनात्मक व्यक्तित्व का धनी हो। इसके पीछे निश्चितरूप से मेरा स्वार्थ ही है। किसी से उम्मीद करना कोई बुरी बात नही। मैंने भी तुमसे उम्मीद की। उम्मीद का पूरा हो जाना बहुत अच्छा होता है। लेकिन ये सच्चाई का केवल एक ही पहलू है क्यों कि उम्मीद का पूरा न होना भी उतना ही सच है। ये निर्भर करता है कि जिससे उम्मीद की जा रही है वो उम्मीद के प्रति कितनी रुचि ले पा रहा है। कई बार रुचि न होने के कारण, उम्मीदे पूरी नही हो पाती। इस बात को मुझे समझना चाहिए था लेकिन मैं नासमझ हूं ना! नही समझ पाया। फिर भी मेरी उम्मीद को पूरा करने को लेकर तुम गंभीर हो, और उसके प्रति रुचि भी दिख रही हो, इसके लिए तुम्हारा धन्यवाद। और मेरे इस कथन से तुम्हे जो पीड़ा पहुंची है, उसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूं।
Sunday, November 19, 2017
बेमन का काम
जिंदगी बहुत बोझिल सी कट रही है। मैं वो काम कर रहा हूँ, जो मेरे घर, परिवार के लोग चाहते है कि मैं करू। पर पता नही मैं ये काम करना चाहता हु या नही? मुझे नही मालूम। मैं उस मुकाम पे हूं, जहा पहुंचने का बहुत लोग सपना देखते है। पर मुझे सच मे अपनी जिंदगी से क्या चाहिए, मुझे नही मालूम। मेरे घर परिवार के लोग चाहते थे, मैं ये काम करू, जो की मैं कर रहा हु। मैं क्या करना चाहता हु, ये मैं ही नही जानता। जब मैं सिविल की तैयारी में नही आया था, तब मेरा कुछ सपना था। मैं एक लेखक बनना चाहता था, और जब मैं फार्मेसी पढ़ रहा था, तब एक वैज्ञानिक। मैंने वैज्ञानिक और लेखक बनने के लिए कुछ हाथ पांव भी मारे। पर उम्मीद के मुताबिक सफलता नही मिली। तब उस वक़्त मेरे घर के लोगो को लगता था कि मैं व्यवसाय ही करू, और पारिवारिक व्यवसाय में उनकी सहायता करू। पर व्यवसाय से मुझे चिढ़ थी। इसलिए मेरा मानना था कि मैं कुछ भी कर लूंगा, पर व्यवसाय में नही आऊंगा। फिर 2008 में एक बार जब मैं पुलिस की ज्यादती का शिकार हुआ। मेरी आत्मा अंदर तक हिल गयी थी। वो घटना एक दुःस्वप्न की तरह मेरे साथ कई सालों तक रही, और मुझे परेशान करती रही। आज भी कभी कभी मुझे उसकी दर्द होता है। इसी के साथ, कुछ और घटनाये, जिनमे मुझे एहसास हुआ था कि मेरी कुछ अहमियत नही। जैसे एम फार्म करने के बाद जब मैं घर आया तो उसके बाद कि कुछ घटनाये। कुछ लोगो ने मुझे रिजेक्ट किया, कुछ ने कुछ कॉमेंट किये, मेरे परिवार पर, पिताजी पे कॉमेंट किये गए। कुछ ऐसी ही घटनाये थी, जिनके कारण मुझे एहसास हुआ, की मेरा और मेरे परिवार का कोई वजूद नही है। मुझे मेरे पिताजी की लाचारी का अहसास हो रहा था। उन्हें समाज मे जो यथोचित सम्मान मिलना चाहिए था, वो नही मिल रहा था। शायद यही सब कारण थे कि मैं सिविल में आया। समाज मे उस यथोचित सम्मान की लालसा में मैं इस क्षेत्र में आया।
कोई नौकरी की तलाश में इस क्षेत्र में आता है, कोई अमीर बनने की ख्वाहिश में। कोई अपनी पारिवारिक परंपरा को बरकरार रखने की चाह में, तो कोई सम्मान की चाह में। मैं इस क्षेत्र में सम्मान की तलाश में आया। अब क्यों कि वो लालसा पूरी हो गयी है तो मुझे इस क्षेत्र में रहने का कोई तुक नज़र नही आता। पर मैं चाह कर भी अब इस प्रोफेशन को नही छोड़ सकता।
कभी कभी सोचता हूं कि आईएएस परीक्षा की तैयारी करु, लेकिन अब लगता है कि पढ़ाई का क्रम टूट गया सा है। मैं हर महीने क्रॉनिकल मैगज़ीन, योजना मैगज़ीन खरीद कर इस उम्मीद के साथ रूम पर लाता हु की पढूंगा, तैयारी करूँगा। पर मेरी पढ़ाई अब हो नही रही है। सुबह से शाम तक केवल टाइम पास करता रहता हूं। क्या करूँ? कैसे अपने अंदर इच्छाशक्ति उत्पन्न कर की तैयारी में मन लगे। मैं चाहूं तो पढ़ सकता हूं, पर चाहू कैसे? यही नही समझ मे आ रहा।
Friday, October 27, 2017
बोझिल दिन
Saturday, September 10, 2016
The sense of an ending..
Madhya Pradesh Public Service Commission (MPPSC) has called me for interview for Madhya Pradesh State Service Examination 2014, scheduled to be held on September 13th 2016 at its office in Indore.
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| "No need to think about MPPSC" |
Most probably, I would be a married man next year. I would be posted as "Assistant Commissioner Commercial Taxes" in any district of my state. So will I be able to prepare in such situations? I have speculations over it. May be the situation would be very unsupportive for me to prepare for this exam. But You have to do your best for selection in UPSC.
I never think, I have became a mature person and always deemed myself as any naive person in any field. In biological terms, I always consider myself as caterpillar and think, my wings are not ready yet.
Although I want to work hard on my studies so that I reach such a place where I no longer need to introduce myself, but I don't know, why am I lagging behind. I think, I need a break from my studies. After break, I would be in such a situation when I can start afresh.
I am a little bit of lazy person too. I just want to sit and do nothing. So for sitting and doing nothing, I have to reach on top. And I see UPSC as provider of such opportunity to reach on top.
I remember those days, when I was an aspirant and I just wanted to get a PCS level job only, so that my family feel proud of me.
In those days, I used to think, "once I would get any job, I would return to my literary world. I would write stories and poems. I would explore authors and novelist. I would leave this civil services competition field for sure."
It was my dream to become a storyteller like Mr Ruskin Bond. I realized that my creativity have been killed from the day, I entered in this competitive field. But now, when I have got a PCS level job, my greed (or the greed of my family persons or surrounding), have entered in a new phase.
Now, they expect best of me. I think, I have been trapped in "chakravyuh" of civil services. I want redemption from this but I can't. I want to close the door to the world of civil services competition, because in my opinion, it would lead me to nowhere. I belong to literary world and not this civil service world. But I am helpless and can't close that door now.
In this way a sense of an ending is engulfing me from both the sides, from competitive world as well as from literary world.
Wednesday, September 7, 2016
The sense of an Indifference..
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| Still of the sky somewhere on my way to Allahabad |
Actually the whole civil services now seems like burden to me. Although I like reading but the idea of reading for passing mere an exam seems boring to me. Many of my colleagues are preparing for the UPPSC mains 2016 exam and some are opting for UPSC exams too. But I am neither reading nor preparing anything. That is why I think I would be remain in the same place while my colleague would surpass me. I know, this is competition. Here only Darwin's theory of evolution is applied. The theory of survival of fittest. Here either you perform or perish. No mercy. Although many of my friends say about myself that I always underestimates myself. According to them I am a talented man yet it is equally true that hard work beats talent when talent doesn't work hard in this competitive world.
But in spite of all these, I have decided for getting married. Actually it is the decision of my family and I have respected their decision. Although I have developed a liking for her yet I don't know whether I would be happy with her or not and vice versa? I can't share all my feelings here on this place but I have really some speculations regarding my future as married man.
So, conclusively I may say that I have a sense of indifference as far as the matter of my first job, my first salary and my marriage is concerned. But a smile floats on my face whenever I see the smiling face of my father and of my grandmother because of my job and marriage. So if they are happy because of me, then, I think I should also get pleasure in the happiness of my elders.



















