Monday, August 19, 2013

"उनकी फितरत, मेरी आदत"

सोचता हूँ की सोचने से क्या होगा?
लेकिन फिर भी कुछ देर सोचता हूँ.
मेरी ख़ामोशी के क्या निहितार्थ है?
यह उन्हें कौन और कैसे बता देता है?

जब उनकी नज़रें मुझसे उलझती है,
मैं कुछ नहीं कहता, बस उन्हें पढता हूँ.
बिना ये जाने, बिना ये समझे कि-
नयनों की भाषा मुझे समझ नहीं आती.

मैं कुछ-कुछ अनुमान लगाता हूँ, 
शायद, वो मुझसे बेहद नाराज़ है.
पर हम दोनों गुमसुम ही रह जाते है,
कोई किसी से कुछ नहीं कहता.

अगर नाराज़ होना उनकी फितरत है,
तो खामोश रहना मेरी आदत.
मैं खुद को बदल नहीं पाता,
और वो मुझे बर्दाश्त नहीं कर पाते.

शायद यही वजह है, की हम अलग है.
हमारी मंजिलें अलग है, और रास्ते भी अलग.
और हम साथ बस उसी दोराहे तक थे,
जहाँ से हम हुए थे, एक-दुसरे से अलग.

जितेन्द्र गुप्ता
Image Courtesy: Vinayak Gupta

Sunday, August 18, 2013

"अधर्म की परिभाषा"


लोग कहते है की मेरा धर्म हिन्दू है,
क्यों कि मेरी पैदाइश हिन्दू थी, और 
मेरे माता-पिता हिन्दू थे, और इसलिए-
हमें हिन्दू ईश्वर को पूजना चाहिए.

पर मैं तो कभी मंदिर जाता नहीं,
किसी भी ईश्वर के सामने कभी,
अपना शीश झुकाता नहीं.
फिर मैं हिन्दू कैसे हुआ?

क्या सिर्फ हिन्दू परिवार में पैदा-
होने से मेरा धर्म हिन्दू हो गया?  
क्या मुझे इतना भी अधिकार नहीं-
की मैं अपना धर्म खुद चुन सकूँ?

और ये भी की क्या धर्म हमारे-
जीवन में इतना ही जरुरी है कि-
बिना धर्म का आवरण ओढ़े,
इस दुनिया में हम जी भी नहीं सकते?

आखिर धर्म की जरुरत ही किसे है?
शायद उन्हें जो बुरा काम करते है?
पर मैंने तो कभी कुछ बुरा किया नहीं,
इसलिए मुझे धर्म की जरुरत भी नहीं.

इस धरती पर पहले इंसान आया,
फिर इंसान ने अनेक धर्मों को बनाया.
यानि धर्मों का जन्मदाता इंसान है,
न की इंसानों के जन्मदाता ये सभी धर्म.

प्रकृति हमें जीवन देती है,
हवा और पानी देती है. और ये सब
देने से पहले वो ये नहीं देखती,
की हमारा धर्म क्या है?

क्या हमने कभी सुना है, की ईश्वर ने,
पानी सिर्फ हिन्दुओं के लिए बनाया है?
या अल्लाह का ये हुक्म है की केवल,
मुस्लिम ही इस हवा में सांस ले सकते है?

ये सभी धर्म क्या केवल ये नहीं बताते,
की तुम्हारी टोपी मेरी वाली से ख़राब है?
चाहो तो आकर मुझसे लड़ लो और देख लो!  
क्या ये धर्म हमें लड़ाने के हथियार नहीं है?

क्या हम सबका केवल एक ही धर्म नहीं- 
हो सकता की हम सभी अधर्मी हो जाएँ?
विश्व का सबसे महान धर्म जो कहता है-
कि हम क्यों किसी के आगे शीश झुकाएं?

हम क्यों खुद को किसी बंधन में बांधे?
जब हम मुक्त होकर जी सकते है?
हम क्यों खुद को हिन्दू या मुसलमान कहे,
जब हम केवल इंसान बन कर जी सकते है?

जितेन्द्र गुप्ता

Saturday, August 17, 2013

कुछ तुम्हारे बारे में....

मैं नहीं चाहता की, मैं कुछ कहूँ,
तुम्हारे बारे में, जो तुम्हे बुरा लगे.

यहाँ तक की मैं सोचना भी नहीं चाहता,
कुछ भी तुम्हारे बारे में, जो मुझे बुरा लगे.

कोशिश करता हूँ खुश रहने की,खुद में-
ही व्यस्त रहने की, जिससे मुझे अच्छा लगे.

पर सारी कोशिशे और मेरे सारे प्रयास, दूर अनंत-
में कहीं गुम हो जाते है, जैसे किसी को पता न चले.

क्या तुम फिर से वैसे नहीं बन सकते?
जैसे पहले थे, हंसते हुए और मुस्कराते हुए.

क्या तुम्हे किसी ने कहा है की मुझसे-
बातें न करो, शायद मुझको बुरा बताते हुए?

मैंने कोशिश की थी, पहले भी और आज भी,
तुम्हे हँसाने की, खुद झूठे ही मुस्कराते हुए.

और एक पल को लगा था, की तुम मान गए हो.
देखा था तुम्हे मुस्कराते हुए, पर नज़रें मुझसे चुराते हुए.

पर तुम फिर वैसे ही बन जाओगे, जैसे पहले थे,
यह मैंने नहीं सोचा था, न सोते हुए न जागते हुए.

तुमको मनाने के लिए, जिन रास्तों पर मैं चला था,
अब आगे वे बंद हो गए है, भ्रमित मुझे बनाते हुए.

मैं क्या करूँ? किस रास्ते पर चलूँ?
दुविधा खड़ी है मेरे समक्ष, मुंह फैलाये हुए.

खैर! मैं अब कभी भी, तुमसे कुछ न कहूँगा.
तुम्हे जो अच्छा लगे वो करो, बस खुश रहो, खिलखिलाते हुए.....

जितेन्द्र गुप्ता
Image Courtesy: Vinayak Gupta

Friday, August 16, 2013

पंछी और आकाश..

सुबह देखा था-
पंछियों को कही जाते हुए.
उड़ते हुए, एक साथ-
पंख हिलाते हुए.
और आकाश के-
नीले पृष्ठभूमि पर,
अनजानी-अनायास,
आकृतियाँ बनाते हुए.

और फिर शाम में
भी इन्हें देखा था.
वैसे ही उड़ते हुए,
पंखो को हिलाते हुए.
उसी आकाश के, लेकिन-
धुंधले पृष्ठभूमि पर,
वैसी ही अनोखी
संरचनाएँ बनाते हुए.

वो शायद पंछी नहीं थे,
हम जैसी आत्माएं थी.
जो आई थी इस धरा पर,
हंसते हुए, मुस्कराते हुए.
और एक दिन ये भी चली जाएँगी,
उन्ही पंछियों की तरह.
जिंदगी की शाम में
ढलते हुए, दम तोड़ते हुए.

जितेन्द्र गुप्ता


Monday, August 5, 2013

"दृष्टिकोण"

एक बार, एक धनवान परिवार का एक पिता, अपने बच्चे को कुछ दिन के लिए गाँव ले गया. वह अपने बच्चे को यह दिखाना चाहता था की गरीब लोग किस तरह अपना जीवन गुजर-बसर करते है.
गाँव में कुछ दिन और रात, उन लोंगो ने एक बहुत ही गरीब परिवार की झोपड़ी में बिताया.
जब वे लौटने लगे, तो रास्ते में पिता ने अपने बच्चे से पूछा, "गाँव में तुम्हारे दिन कैसे बीते?"
"बहुत ही शानदार!" बच्चा ख़ुशी से बोला.
"क्या तुमने यह देखा की गरीब लोग कैसे रहते है?" पिता ने उत्सुकता से पूछा.
"हाँ पिता जी!" बच्चे ने कहा.
"तो मुझे कुछ बताओ की तुमने क्या देखा?" पिता ने कहा.
बच्चे ने कहा, "पिता जी! मैंने देखा की हमारे पास हमारे घर में एक ही कुत्ता है, जब की उनके पास चार है. शहर में हमारे घर में बगीचे के बीच में एक ही तालाब है, जब की इनके पास पूरी की पूरी नदी है जिसका कोई अंत नहीं है. रात को हम अपने घर को बिजली के बल्बों से रोशन करते है, जब की इनके घर को रोशन करने के लिए हजारों सितारे रातभर जगमगाते है. हमारे घर की सीमा घर के सामने की चारदीवारी पर ख़त्म हो जाती है, जबकि इनके पास पूरा का पूरा क्षितिज है."
बच्चा कहता जा रहा था, "हमारे पास तो शहर में जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा है जिस पर हमारा घर बना है, जब की उनके पास उनके खेत है जो हमारी नज़रों की सीमा से भी परे है. पिता जी! और क्या कहूँ की हम खुद अपना काम करने में खुद को अक्षम पाते है, इसीलए हमारे घर पर नौकर रखे गए है, जो हमारी सेवा करते है, जब की ये लोग खुद अपना काम तो करते ही है, दूसरों की सेवा भी करते है. हमें हमारे भोजन के लिए अन्न खरीदना पड़ता है, जब की ये अपने खेतों में अन्न उगाते है."
बच्चे का पिता निःशब्द हो चुका  था.
और अंततः बच्चे ने कहा, "पिता जी मैं आपको धन्यवाद् कहना चाहूँगा!"
पिता ने पूछा, "वो किसलिए मेरे बच्चे?" 
"यही की आपने हमें यह देखने और महसूस करने का मौका दिया की हम कितने गरीब है?" बच्चे ने कहा और चुप हो गया.
सौजन्य से: http://inspiringshortstories.org/how-poor-we-are/
अनुवाद: जितेन्द्र गुप्ता 


Sunday, July 14, 2013

Great Book about Jaunpur

While searching on the internet, I came to know about a book written on "Jaunpur" by a famous historian A.L. Basham.
Arthur Llewellyn Basham was an Indologist and a professor at London’s School of Oriental and African Studies.Basham wrote many books on India, including A Cultural History of India and The Sharqi Sultanate Of Jaunpur. He also co-authored The Origins and Development of Classical Hinduism, Religious Beliefs and Practices of North India During the Early Medieval Period, and History and Doctrines of the Ajivikas:A Vanished Indian Religion. But his most popular work is the book The Wonder That Was India.


For More information about this book:

Sunday, June 30, 2013

"अम्मा"

मोह ममता माया में 
लिपटी एक "आत्मा"।
और कोई नहीं, वो 
है मेरी "अम्मा" ।

मेरी सोच, मेरा-
-व्यक्तित्व, उसकी छाया।
मेरा हर एक दुःख,
उसने अपनाया।

एक सच्ची मार्गदर्शक,
एक महान व्यक्तित्व।
मेरे लिए मेरे जीवन
का आदर्श चरित्र । 
जितेन्द्र गुप्ता
This poem I have written over my grandmother, whom I call "Amma".