"Hold on to your dreams, do not let them die, we are lame without them, birds that can not fly..." Ruskin Bond
Sunday, January 13, 2019
Saturday, January 5, 2019
धूप का एक टुकड़ा...
ये काल्पनिक दुनिया..
Tuesday, June 26, 2018
केशरी साहब
जहां भी रहेगा, रोशनी करेगा,
किसी चिराग का अपना मकाँ नही होता।
आज सर के साथ एक साल का साथ खत्म हो गया। पिछले साल जब अपनी पोस्टिंग के लिए मैं पीलीभीत आया, तभी से एक वाक्यांश दिलोदिमाग में बैठ गया था, "पीलीभीत मतलब केशरी साहब"।
सर अपने आप मे एक लर्निंग स्कूल है, बल्कि मैं तो कहूंगा कि वो खुद में एक "आर्ट ऑफ लिविंग" के प्रत्यक्ष उदाहरण है। एक ऐसे इंसान जिनके चेहरे पर मैने कभी चिंता की लकीरें नही देखी, कभी किसी समस्या में उलझे नही देखा। ऐसा नही था कि यहां समस्याएं नही थी। समस्याएं तो थी, जैसे अन्य जगहों पे होती है, लेकिन हर समस्या का समाधान, अपने केशरी साहब की उपस्थिति एवं अनुपस्थिति में स्वयमेव निकल आता था। पिछले एक साल में काफी कुछ यहां बदल गया। जब भी परिवर्तन होता है तो काफी समस्याएं भी होती है लेकिन हमें कभी इसका अहसास नही हुआ। जैसे एक पिता छाते की तरह धूप, बारिश से अपने परिवार की सुरक्षा करता है, वैसा ही सर का स्वभाव है। सर दूर क्षितिज के वो बिंदु है जहां पर मैं की भावना ही मिट जाती है और हम सब मे "हम" की भावना जाग्रत हो जाती है।
जिस उम्र में आकर लोग स्वस्थ कैसे रहे, इसी की बात करते है, क्या खाएं, क्या पीये, कैसे रहे, कब सोये इसके बारे में सोचते है, तब भी शरीर रोग ग्रस्त ही रहता है, उस उम्र में, उम्र शायद सर के लिए गिनती के अंक है और कुछ नही। देश मे शायद ही कोई ऐसी जगह बची हो, जहां सर के पैर न पड़े हो। भारत का पूरा भ्रमण, वो भी इस उम्र में आकर। हममे और आपमे शायद वो ऊर्जा न हो जितनी सर में इस उम्र में भी है। बिंदास जीवनशैली, गजब की जीवटता। सर के बारे में कुछ लिखना, सर के व्यक्तित्व की विशालता के सूरज को दिया दिखाने जैसा है। वैसे तो पीलीभीत एक छोटी सी अनजान सी जगह है, यहां सीखने को बहुत नही था लेकिन शायद मैं भाग्यशाली था जो मुझे सर का सानिध्य मिला .......
Sunday, January 7, 2018
कशमकश (भाग 2)
सवाल कई है, जो उमड़ घुमड़ कर मेरे चिन्तनलोक में मंडरा रहा है। पर सबसे ज्यादा वो एक प्रश्न, जिसपे मैं विचारोत्तेजित हूँ, वो ये है कि, मैं क्या करूँ? मैं क्या कर सकता हूँ? क्या मैं कुछ कर पाऊंगा? कहानी कुछ इस तरह से है कि पिता जी ने कॉलेज खोलने के लिए जिस ट्रस्ट का पंजीकरण करवाया था, उसपर आयकर की नोटिस आयी। जवाब देने के लिए जब पिता जी लखनऊ गए, तो अधिकारी ने उनसे डेढ़ लाख की मांग की। पिता जी पचास हजार देने को तैयार थे, पर वो नही माना, उन्हें ट्रस्ट का पंजीकरण निरस्त कर दिया। अब मामला अधिकरण में गया है। मुझे दुराशा ही नही नही अपितु पूरा यकीन है कि अधिकरण में दो या तीन लाख से नीचे की मांग तो नही ही होगी। उस अधिकारी के पास पिताजी केवल चार्टर्ड अकाउंटेंट के साथ ही नही गए थे, बल्कि कई उसी पद पर रह चुके भूतपूर्व अधिकारियों का रिफरेन्स ले के गए थे। लेकिन उसे पैसे चाहिए थे तो बस चाहिए थे। उसने अपने पद की शक्ति का भरपूर प्रयोग किया और अब ज्यादा दिए बिना बात ही नही बनेगी। कहानी अभी जारी रहेगी, लेकिन यक्ष प्रश्न वही रहेगा, मैं क्या करूँ? मैं क्या कर सकता हूँ? क्या मैं कुछ कर पाऊंगा?
अपने कार्यालय में
अभी पिछले हफ्ते मैने एक फ़िल्म देखी थी। मैट्रिक्स!
Saturday, December 16, 2017
इन दिनों...
हम शायद इस दुनिया मे कुछ कड़वे अनुभव लेने के लिए ही आते है। कौन जानता है कि ये दुनिया सत्य है या मिथ्या है? लगता है जैसे जब मौत होगी तो नींद से उठूंगा, और इस दुनिया के मिथ्या रूप का भान होगा। लगता है जैसे ये दुनिया एक सपना है, मौत के बाद ही नींद खुलेगी। गीता के अनुसार हम खाली हाथ आये है, खाली हाथ जाएंगे।
ताल्लुक कौन रखता है किसी नाकाम से लेकिन,
मिले जो कामयाबी सारे रिश्ते बोल पड़ते है,
मेरी खूबी पे रहते है यहाँ अहले जबाँ खामोश,
मेरे ऐबों पे चर्चा हो तो गूंगे बोल पड़ते है।
यूँ तो मुझमे कोई ऐब नही,
बैठ जाता हूँ मिट्टी पे अक्सर,
क्यों कि मुझे मेरी औकात अच्छी लगती है।
सुबह की सैर.....
आजकल बनकटी, पीलीभीत के मार्ग पे सुबह की सैर को जा रहा हूँ। हालांकि ये वही मार्ग है, जिसपे बाघ अक्सर जंगल से निकल आता है, और लोगो पे हमला कर देता है। पर आजतक मेरी बाघ से मुलाकात नही हुई। सुबह जाते वक्त कुछ डर तो लगता है, लेकिन बाघ दिखने की जिज्ञासा भी रहती है। लगता है जिस दिन बाघ से मुलाक़ात होगी, या तो बाघ रहेगा या मैं....
Tuesday, December 12, 2017
कशमकश.....
"हम समझ गए, आपका मन नही है इसलिए हम फ़ोन रखते है", उन्होंने कहा और फ़ोन काट दिया। और मैं जैसे बीच मझधार डूबता उतराता रहा। खुद को ये समझाता रहा, की जब उनके हिसाब से मेरा वो बाते करने का मन होगा, तो ही वो बाते करेगी, नही तो यही कहेंगी, "हम समझ गए, आपका मन नही है, इसलिए हम फ़ोन रखते है"। शायद उन्हें सिर्फ अपने मन का ख्याल आता है, मेरे मन का नही। उन्हें लगता है कि मैं ही उन्हें उत्पीड़ित करने वाला इंसान हूँ, और वो ही केवल रोना जानती है। जब कि सच्चाई ये है कि रोता मैं भी हूँ, बस आंसू नही निकलते। उत्पीड़ित मैं भी होता हूँ, बस आह नही निकलती।
उनका कहना था कि मुझे पढ़ना चाहिए, तैयारी करनी चाहिए। उन सब को मुझसे बहुत उम्मीदें है कि मैं DM या SDM बनूँगा, और फिर हमारे पास रुपया, पैसा, धन, दौलत, गाड़ी, बंगला, इज़्ज़त, शोहरत, नाम और सम्मान सब कुछ होगा। उनकी मुझसे जो उम्मीदे है उसको मैं नाउम्मीद में कैसे तब्दील कर सकता हूँ? बहुत मुश्किल है, और बहुत कष्टदायी भी। वो किसी ऐसे परिचित का उदाहरण दे रहीं थी जो BSA है। बता रहीं थी कि उस BSA ने इतनी दौलत बना ली है कि उसके पास पैसे रखने की जगह नही है। इतनी अकूत दौलत इकट्ठा हो गयी है कि पूरा का पूरा गांव ही उसके पैसे से शराबी बन गया है। उसकी बातें सुनकर मुझमे सो रही पैसे बनाने की क्षुधा फिर से जागृत होने लगी। और शायद अप्रत्यक्ष रूप से वो मुझे भी प्रोत्साहित कर रही थी कि मैं भी उसी BSA जैसा बनू। पर मेरी समझ मे नही आता कि पहले मैं पढू, लिखू, और सरकारी सेवा में जाऊ, तब लूट खसोट कर के दो नंबर का पीटू। इससे अच्छा है कि मैं केवल अर्थसाधना में ही न लग जाऊ? आखिर अंतिम उद्देश्य पैसा ही कमाना है तो पढ़ने की क्या आवश्यकता है? क्यों मैं लक्ष्मी को साधने के लिए सरस्वती को साधन बनाऊ?
इन दिनों अजीब सी कशमकश से गुजर रहा हूँ। सच मे अजीब सी कशमकश से। मुझमे भी दो नंबर का पीटने का शुरूर छा रहा है। पर उसमे नैतिकता आड़े आ रही है। वैसे तो इन दिनों ज्यादा कुछ दो नंबर का मिलता नही,लेकिन जब मिलता है तब नैतिकतावश खुद पे शर्म आती है। जमीर गवाही नही देता की इस तरह मैं वो इकट्ठा करू। पर नैतिकता को एक किनारे रख के मैं पीट ही देता हूँ। लेने के कुछ समय तक मुझे खुद पे शर्म आती है। फिर अच्छा लगने लगता है। पीटने के बाद अच्छी फीलिंग आती है। पर साथ ही एक कसक रह जाती है कि मेरे ही पद पे अन्य जगहों पे रहने वाले लोग मुझसे ज्यादा पीट रहे होंगे। मैं उतना नही कर पा रहा हूँ। और मुझमे और ज्यादा पीटने की भूख लग जाती है। ये सिलसिला चलता रहता है। थमता नही। और मैं इसी कशमकश में डूबता उतराता हूँ। जब कुछ नही मिलता तो खराब लगता है, जब कुछ मिलता है तो भी शर्म आती है, हालांकि मिल जाने के कुछ देर बाद अच्छा लगने लगता है, किन्तु ये खुशी मेरी भूख को बढ़ा देती है। और मुझे फिर से खराब लगने लगता है। कशमकश का ये सिलसिला चलता रहता है, और मैं इसी में डूबता उतराता रहता हूँ। मेरी समझ मे नही आता कि मेरी भूख क्यों बढ़ रही है? मेरे खर्चे तो सीमित है, कोई महंगा शौक भी नही है। तो इतनी भूख क्यों?
आज तक जितना भी मैंने इस जगह पे पीट कर बनाया होगा, सब मैंने घर पे दादी अम्मा को समर्पित कर दिया है। उस राशि से बहुत कम का इस्तेमाल ही मैंने शायद किया होगा। शायद मैं ऐसा इसलिए करता हूँ ताकि घर वालो को ये लगे कि कल तक जो पैसे वो दिया करते थे, अब उनकी लेने की बारी आई है। पर ये अर्धसत्य ही है।
अभी मेरे पिताजी को ही मेरे ही विभाग के एक अधिकारी को एक मोटी सी राशि बतौर सुविधाशुल्क देनी पड़ी ताकि काम हो जाये। उसमे मेरी भी पहचान काम नही आई। जब पिता जी ने मुझे इस बारे में बताया तो मेरा मन घृणा, क्षोभ, क्रोध और शर्म से भर गया। मेरा विश्वास इंसानियत से उठ गया। ये कैसा समाज है जिसका हम हिस्सा है? यहाँ करदाता भी भ्रष्ट, कर अधिकारी भी भ्रष्ट और कर वसूलने वाली सरकारे भी भ्रष्ट। जब सब अपनी अपनी जेबे भरने में लगे हुए है तो जरूरत क्या है इस भ्रष्ट तंत्र की। क्या जरूरत है ऐसे कानून की, जो भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता हो?
इस भ्रष्टतंत्र में आकर मैं भी दोगला हो गया हूं। लेते वक्त मुझे जो भ्रष्टाचार नही दिखता, देते वक्त वो बहुत चुभता है। खलता है। धीरे धीरे मेरा विश्वाश भी इंसानियत से उठ रहा है। अब मुझे सब कुछ पैसा ही दिख रहा है। भले ही मेरी जरूरते सीमित हो, भले ही मुझे कोई महंगा शौक न हो पर सब कुछ शायद पैसा ही है।
मुझे माफ़ कर देना की मैं तुम सब की उम्मीदों को नाउम्मीदी में बदल रहा हूँ। जब तुम्हारी और सब की नज़रों में सब कुछ पैसा ही है तो मैं पैसा ही बनाने पे ध्यान केंद्रित करता हूँ। सरस्वती मेरे लिए मायने नही रखती जब लक्ष्मी जी मेरा लक्ष्य है।
जितेंद्र




