Saturday, October 28, 2017

बुलबुले

विचारो के बुलबुले,
बनते रहते है,
मन के किसी कोने में,
अनजाने ही, अनचाहे ही।

सोचता हूं,
कुछ को कैद कर लूं,
पर हाथ लगाते ही,
बुलबुले फूट जाते है।

जानता हूं इनकी तकदीर,
ये बनते है, फूटने के लिए,
पर मेरी भी ये जिद है इन्हें,
अपना बनाना है एक दिन।

जितेंद्र

Friday, October 27, 2017

बोझिल दिन

पता नही किस शायर ने लिखा है की -
उसूलों पर जहाँ आंच आये,टकराना जरूरी है।
जो जिंदा हो तो फिर जिंदा नज़र आना जरूरी है।
पर जिस किसी ने भी ये लिखा है मेरे ऊपर तो नही ही लिखा है। दीपावली पे घर आया, तो वापस जाने का दिल नही कर रहा था। दरअसल पीलीभीत जैसी छोटी सी जगह में आप कुछ सीख नही सकते। अगर आप आगे की पढ़ाई के लिए तैयारी करने चाहते है तो पढ़ सकते है किंतु वह माहौल नही है। इसके अलावा न तो वह आपको अंग्रेजी अखबार पढ़ने को मिलेगा, न ही प्रतियोगी परीक्षाओं से संबंधित पुस्तके। मैंने अपने स्वभाव में एक परिवर्तन गौर किया है। मुझमे काम से जी चुराने की प्रवित्ति बढ़ रही है। जब आप को अपने काम के बारे में जानकारी नही होती, तो जी चुराने की प्रवित्ति का पनपना स्वाभाविक है। मैंने अपनी पोस्टिंग के संदर्भ में एक लोग से ही बात की थी। पर उन्होंने कोई रुचि नही ली या कहे कि तत्कालीन परिस्थियां ऐसी थी कि अच्छी जगहे खाली नही थी। इसलिये मुझे समझ नही आया कि अपनी पोस्टिंग पे मैं खुश हो जाऊं या मातम मनाउ। ये शायद मेरे साथ हुआ एक घटिया धोखा था। अपनी पोस्टिंग के संदर्भ में मैंने जिनसे बात की थी, वो मेरे गांव के ही थे, मेरे विभाग में ही थे। पर उन्होंने मुझसे एक तरह से धोखा किया। आज कुल 6 महीने हो गए, पीलीभीत में आये हुए। पर यहा न तो मैं अपने कार्य के बारे में ज्यादा कुछ जान सका हु, न ही पढ़ाई पे ध्यान दे सका हु। त्रिशंकु बन के रह गया हूं। मेरे साथ ही ट्रेनिंग करने वाले कुछ महानुभाव अच्छी जगहों पे अपनी पोस्टिंग करवाने में सफल रहे थे। इसके अलावा आज ही एक और लिस्ट आयी, जिसमे मेरे ही बैच के अन्य अधिकारियों की पोस्टिंग का जिक्र है। निस्संदेह उनमे से बहुत से अधिकारियों को अच्छी जगहों पे बड़े स्टेशनो पे पोस्टिंग मिली है। पता नही क्यों, अच्छा नही लग रहा। जब मैं अपने पोस्टिंग की तुलना, आज के लिस्ट से करता हु, तो अहसास होता है, की जैसे हमारे साथ एक भद्दा मजाक किया गया है। पोस्टिंग को लेकर हुआ ये कड़वा भेदभाव मेरे मन को वेध रहा है, पीड़ा पहुंचा रहा है। ये कड़वा अनुभव मुझे याद रहेगा।
हालांकि पीलीभीत एक एकांत जगह है, बहुत शांत जगह है। बहुत लोगो को पता भी नही की पीलीभीत नाम की कोई जगह भी अस्तित्व में है। जब कोई मुझसे मेरी पोस्टिंग के बारे में पूछता है, और मैं जवाब देता हूं, की पीलीभीत, तो उसका अगला सवाल यही होता है, की ये कहा है? फिर मुझे उसे ये बताना पड़ता है कि पीलीभीत उत्तराखंड और नेपाल की सीमा से लगा एक छोटा सा जिला है। प्राकृतिक सुंदरता वहाँ भरपूर है, बाघ और अन्य जंगली जीव जंतु है, घूमने लायक जगह है, पर नौकरी की इस सीखने वाली स्टेज पे जिस जगह मेरी पोस्टिंग होनी चाहिए थी, वैसी हुई नही। 
आज दसवा दिन है, दीपावली पे जब मैं घर आया था। और अभी भी घर पे ही हु। कार्यालय पुरानी जगह से नई जगह शिफ्ट हो रहा है। इसलिए अभी कार्यालय का सेटअप ही हो रहा है। मैं कल निकल जाता, इलाहाबाद से मेरा रिजर्वेशन था। लेकिन ट्रेन बहुत लेट थी, इसलिए टिकट पे टी डी आर फ़ाइल किया, और इलाहाबाद से घर आ गया। अब परसो पीलीभीत निकलूंगा। बोझिल मन के साथ, नीरस आत्मा लिए हुए। पता नही कब ये भटकाव खत्म होगा। पता नही मैं क्या चाहता हूं, अपनी जिंदगी से क्या मांगता हूं, क्या करना चाहता हूं?

जितेंद्र

Monday, October 9, 2017

वंशज

उम्र यही कोई 10-12 साल रही होगी उसकी। मैं स्टेशन पर अपनी गाड़ी का इंतज़ार कर रहा था, की वो मेरे सामने आ गया। हाथ मे उसके पिटारा था, और एक सांप उसमे बैठा हुआ था। सांप अपना फन इधर उधर हिला लेता था। पर ध्यान से देखने पर यह लग रहा था कि सांप उदास सा बेमन से उस पिटारे में बैठा हुआ था। लगता था कि जैसे वो अपनी जिंदगी से ऊब गया है।
आम तौर पर बहुत सी चीजों की तरह, सांप से भी हमे डरना सिखाया जाता है। पर शायद उसके गुरु ने या माँ-बाप ने उसे सांप से डरना नही, उसे पालना सिखाया होगा। एक हुनर जो हर बाप अपने बेटे को जीते जी दे के जाता है ताकि उसका बेटा अपनी जिंदगी में गुजर बसर कर सके।
"नाग देवता का आशिर्वाद ले लीजिए!" उस बच्चे ने कहा।
हालांकि मेरा इन धार्मिक मान्यताओं पर विश्वास नही है पर फिर भी मैंने अपने बटुए से कुछ सिक्के निकाले, और उसके हाथ मे पकड़ा दिए। वो बच्चा पैसे लेके चलता बना। आमतौर पर मैं भीख देने से परहेज करता हूँ। पर उस लड़के में मुझे कुछ ऐसा लगा कि मैं खुद को रोक नही सका। शायद वो बच्चा सदियों पुराने उन लोगो का वंशज था, जिन्हें देखकर अंग्रेजो ने भारत को सपेरों का देश कहा था। एक तरह से वो हमारी परंपरा एवं संस्कृतियो का संरक्षण कर रहा था। जिन सांपो से हम डरते है, और उन्हें देखते ही मार डालते है, वो बच्चा उन्हें पाल रहा था यानी अप्रत्यक्ष रूप से सापों को पालकर वो उनका संरक्षण भी कर रहा था। 
आजकल के आधुनिक प्रगतिशील विचारो का अपना महत्व है उन्हें नज़रअंदाज़ नही किया जा सकता जैसे उस बच्चे को इस उम्र में पढ़ना चाहिए, एवं एक सभ्य नागरिक बन के देश एवं समाज की उन्नति मे अपना योगदान देना चाहिए। पर इन्ही सब के कारण तो भारत विविधताओं का देश माना जाता है।

Friday, September 29, 2017

तलाश

भटकता रहता हूँ,
लेकर अपना तन को,
ताकि मिल सके सुकून,
मेरे इस मन को।

तलाश जारी रहती है,
ना जाने किस सुकून की,
दिन-रात, सुबह -शाम,
यहां -वहां, इधर-उधर।

भटकाव खत्म नही होता,
इच्छाएं कभी नही मरती,
अभिलाषा जिंदा रहती है,
मरता हूँ तो सिर्फ मैं।

पल-प्रतिपल, क्षण-प्रतिक्षण,
कभी न बुझने वाली आग,
दिल मे जलाये रखता हूँ, या
खुद जलता रहता हूं।
जितेंद्र

Friday, September 22, 2017

उलझने

हज़ारों उलझने राहों में,
और कोशिशें बेहिसाब,
इसी का नाम है जिंदगी,
चलते रहिये जनाब।
अज्ञात

Friday, August 4, 2017

वो

उसके रहने से, घर मे खुशी रहती है,
वो नही होती तो घर मे वीरानी आ जाती है।

उसके होने का अहसास ही बहुत है मेरे लिए,
न होने के बारे में मैं सोच भी नही सकता।

आफिस में रहूँ, या कही सफर में रहूँ,
वो हर वक़्त मेरे साथ होती है।

हर वक़्त, हर पल उसकी मुस्कान साथ होती है,
वो नही होती, तो भी वो मेरे साथ होती है।

वो जो मेरी हमसफ़र है, कह नही पाता,
उससे कुछ भी, क्यों कि वो तो मैं ही हूँ।

वो जो मेरा आधा हिस्सा है, उसमे भी मैं ही हूँ,
अपेक्षा करता हूँ, वो सब जान जाएगी खुद से ही।

बिना कुछ कहे, बिना कुछ बताये, उसको,
एक दिन मुझको, पहचान जाएगी खुद से ही।

जितेन्द्र

मैं

बंज़र नही हूँ मैं
मुझमे बहुत सी नमी है,
दर्द बयां नही करता,
बस इतनी सी कमी है।