"Hold on to your dreams, do not let them die, we are lame without them, birds that can not fly..." Ruskin Bond
Saturday, December 14, 2013
Monday, December 2, 2013
“मिड डे मील”
प्राथमिक विद्यालय
के प्रधानाचार्य दोपहर के वक़्त स्कूल में बनने वाले मिड डे मील की गुणवत्ता को
लेकर कई दिनों से परेशान थे. हाल ही में बिहार के परिषदीय विद्यालयों में हुयी
घटनाओं ने उनकी परेशानी को और उभार दिया था. उन्होंने कई बार गाँव के प्रधान से इसकी
शिकायत की, की ‘दुकानदार ख़राब स्तर की खाद्य सामग्री (राशन) विद्यालय को भेजता है’,
पर बात नहीं बनी. सामने तो ग्राम प्रधान भी प्रधानाचार्य की बात में अपना सुर मिला
देते थे, ‘बच्चों को मध्याह्न भोजन के रूप में उच्च गुणवत्ता का भोज्य पदार्थ
मिलना उनका हक है, और इसके लिए हमसे जो कुछ भी बन पड़ेगा हम करेंगे.’ पर शायद ग्राम
प्रधान भी, प्रधानाचार्य की पीठ पीछे दुकानदार से मिले हुए थे और प्रधानाचार्य की
लाख शिकायत के बावजूद कही कुछ नहीं सुधर रहा था.
ऐसे ही चल रहा था की
एक दिन प्रधानाचार्य को इच्छा हुयी की बच्चों को आज मेनू से अलग खीर बना कर खिलाई जाय.
व्यवस्था होने लगी. सभी सामग्री इकठ्ठा की गयी. पर खीर के लिए ‘मेवे’ भी चाहिए थे.
सो दुकानदार से मेवे भी भिजवाने को कहा गया.
रोज के ‘मेनू’ से
अलग, आज मेवे की मांग देखकर, पहले तो दुकानदार सकपकाया, किन्तु फिर उसने मेवे दे
दिए. उसके दिए हुए ख़राब मेवों को देखकर प्रधानाचार्य से ना रहा गया. वो उसी
सामग्री को लेकर दुकानदार के पास पहुंचे और शिकायत भरे लहजे में कहा, “क्या भाई!
तुम्हारी दुकान में जो भी ख़राब सामग्री होती है वो तुम विद्यालय में भिजवा देते हो.
पैसे तो तुम्हे पूरे मिलते है, फिर सामान ख़राब गुणवत्ता का क्यों?”
दुकानदार से यह
शिकायत सुनी नहीं गयी, उसने कहा, “मास्टर साहब! हमारी दुकान में यही है और ग्राम प्रधान
का यही आदेश भी है की ऐसी सामग्री ही विद्यालय में भिजवाई जाय.”
प्रधानाचार्य ने
कहा, “पर क्या तुम्हे दिख नहीं रहा की इन मेवों में घुन लग गया है. भला इसे कोई
कैसे खा सकता है.”
दुकानदार ने तुरंत
ही जवाब दिया, “मास्टर साहब! आप क्यों परेशान होते हो? ये मेवे मैंने आपको या आपके
घर के बच्चों को खाने के लिए थोड़े ही दिए है? ये तो आपके विद्यालय के बच्चों को खाने
के लिए है.” इतना कहकर दुकानदार अपने काम में व्यस्त हो गया.
प्रधानाचार्य
निरुत्तर हो चुके थे. उन्होंने सोचा, ‘सच में, ये मेरे खाने के लिए नहीं, ये तो
बच्चों के खाने के लिए है!’ और वो उसी मेवों के साथ विद्यालय वापस आ गए. दुकानदार
ने उन्हें मिड डे मील के मायने समझा दिए थे.
जितेन्द्र गुप्ता
“बचपन का दोस्त”
उस दिन जब मैंने उसे देखा, तो एकाएक पहचान नहीं
सका. वह अपनी ट्राली को खींचता हुआ सड़क पर नंगे पाँव ही चला जा रहा था. मैं अपने काम
पर जाने वाले रास्ते पर था. हम दोनों की नज़रें कुछ देर तक एक-दुसरे से उलझी रही,
पर समयाभाव की वजह से न मैंने रुकना मुनासिब समझा और न उसने रुकने की जहमत उठाई.
पर मैं उसको पहचानता तो था क्यूँ की यह बात मुझे
आधे घंटे बाद याद आयी थी. “मनमोहन”, हाँ! यही तो नाम था उसका. जब मैं और वो छोटे
थे, हम एक ही स्कूल में पढ़ते थे. लेकिन जहाँ मैं छोटा होने की वजह से छोटा था,
वहीँ वो असामान्य रूप से छोटा था. दुसरे शब्दों में ‘बौना’ था. यहाँ तक की उस समय
भी वो मेरी लम्बाई का आधा था पर उसके चेहरे पर, हमारे चेहरों की अपेक्षा, हमेशा
दुगनी मुस्कान खिली रहती थी. हालाँकि कक्षा के कई लड़के उसको हमेशा चिढाते और उसका
मजाक उड़ाते. हम दोनों की शारीरिक लम्बाई में असमानता, कभी हमारी मित्रता में आड़े
नहीं आयी. हम दोनों साथ ही स्कूल जाते. वो स्कूल जाने के आधे रास्ते पर मेरा
इंतजार करता, फिर स्कूल में साथ में खाना खाते और साथ ही घर वापस आते. आधे रास्ते
पर उसका-हमारा क़स्बा अलग हो जाया करता था. कुछ सालों तक वो हमारे साथ पढ़ा, फिर
उसका स्कूल आना बंद हो गया.
स्कूल के दिनों में, गर्मी की दो महीनो की छुट्टी
के दौरान, कौन हमसे अलग होता था, इसकी जानकारी हमें अक्सर ना हो पाती. बालमन इतना
हिसाब-किताब न रख पाता. लेकिन कुछ दिनों बाद हमें पता चला था की मनमोहन के पिता
जी, मनमोहन को किसी सर्कस कम्पनी को बेचने जा रहे थे. यह बात जितनी आश्चर्यजनक थी,
उतनी ही सच भी थी. सर्कस में हमें बौनों का जोकर बनते देखना बहुत पसंद आता था, पर
इस तस्वीर का दूसरा पहलु ये था, की उस फेहरिस्त में मेरा दोस्त मनमोहन भी शामिल
होने जा रहा था.
एक बाप का दिल पत्थर हो सकता है, तभी शायद उसके
पिता जी उसे बेचने के बारे में सोच रहे थे. पर एक माँ का दिल तो माँ का ही होता है
वो अपनी संतान से कभी अलग नहीं हो सकती. भले ही उसकी संतान सामान्य हो या
असामान्य. उसकी पिताजी की इच्छाओं पर उसकी माँ ने पानी फेर दिया था, और मनमोहन को
बेचने का ख्याल उसके पिता जी को त्यागना पड़ा था.
उसके बाद मैंने मनमोहन को फिर कभी स्कूल में नहीं
देखा. मैं अपनी पढाई के उद्देश्य से लगातार घर से बाहर ही रहा, और काफी दिनों बाद
अब मेरी नौकरी गाँव के पास लग गयी थी. पर आज उसे ट्राली खींचते हुए देखकर सहसा ये
यकीन करना कठिन हो गया था, की मनमोहन आज भी उतना ही लम्बा था जितना वो बीस साल पहले
था. फर्क सिर्फ इतना था की उसकी उम्र अब सात के बजाय सताइस हो गयी थी.
जितेन्द्र गुप्ता
Tuesday, November 12, 2013
Sunday, October 20, 2013
'प्रेरणा'
‘सर’ कक्षा में विद्यार्थिओं को ‘प्रेरणा’ विषय
पर व्याख्यान दे रहे थे और विद्यार्थिओं में ही उनका एक विद्यार्थी, ‘ईश्वर’, यह
व्याख्यान बड़े ध्यान से सुन रहा था.
“बच्चों! हमें हर एक चीज, हर एक जीव और हर जंतु से
प्रेरणा मिलती है. यहाँ तक की रास्ते पर पड़ा एक निर्जीव पत्थर भी हमें कुछ न कुछ प्रेरणा
अवश्य देता है. लेकिन यह पूरी तरह हमारे ऊपर है की हम उससे क्या प्रेरणा या सीख
ग्रहण करते है. प्रेरणा जैसी यह बहुमूल्य चीज जो हमें इतनी बहुतायत से मिलती है,
हम इसकी कदर बिल्कुल भी नहीं करते. जब की इस जीवन में हमें कुछ कर गुजरने के लिए
केवल एक प्रेरणा की जरुरत होती है.”
ईश्वर, पूरी कक्षा के दौरान ‘सर’ की बात ध्यानपूर्वक
सुनता रहा. इधर कई दिनों से वो बहुत दुविधा में था और अपने भविष्य को लेकर काफी
चिंतित था. स्नातक की पढाई तो वो कर रहा था लेकिन आगे क्या करना है? जीवन में क्या
बनना है? यह उसे समझ में नहीं आ रहा था.
उस दिन सारा वक़्त जागते हुए, और रात में बिस्तर
पर लेटे हुए, ईश्वर सर की ही बात को सोचता रहा. “क्या उसे भी कहीं से प्रेरणा
मिलेगी की उसे जीवन में क्या करना है, क्या बनना है?” ताकि सब लोग उस पर नाज़ कर
सकें. और यही सोचते हुए उसे नींद आ गयी. सुबह जल्दी उठकर, अपनी आदत के अनुसार, वो पास के ही कॉलेज में बने स्टेडियम
में ‘सुबह की दौड़’ लगाने चला गया. कॉलेज के मैदान पर ईश्वर ने रोज की तरह दौड़
लगायी. एक, दो, तीन..... और जब तक वो थक नहीं गया. फिर स्टेडियम के किनारे बने
सीढियों के पास, व्यायाम करने चला गया.
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| Inspiration |
वहां और भी लोग थे पर सब अपने में मशगूल थे. किसी
को किसी की परवाह नहीं थी. ईश्वर और दिनों की अपेक्षा आज कुछ ज्यादा दौड़ा था, पर
किसी ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया. ईश्वर अपना व्यायाम करने में व्यस्त हो चुका
था, की तभी उसके बगल में कुछ दुरी पर बैठा एक लड़का चिल्ला पड़ा- “जय हिन्द सर!” ईश्वर
को कुछ अटपटा सा लगा. उसने उस लड़के की तरफ देखा, फिर मैदान की तरफ देखा. वो लड़का मैदान
पर दौड़ रहे किसी शख्श के लिए चिल्लाया था, जिसने उस लड़के की तरफ ध्यान नहीं दिया
था. ईश्वर भी, फिर से, अपना व्यायाम करने में व्यस्त हो गया. वो लड़का जो चिल्लाया
था, अपने एक दोस्त से बातें कर रहा था. और ईश्वर के पास उनकी आवाजें आ रही थी.
“देख रहे हो, कितनी छोटी उम्र के है और पैर से कुछ विकलांग भी है, पर फिर भी पांच-छह लोंगो को दौड़ में पीछे छोड़ दिया.” वो लड़का अपने दोस्त से कह रहा था.
“देख रहे हो, कितनी छोटी उम्र के है और पैर से कुछ विकलांग भी है, पर फिर भी पांच-छह लोंगो को दौड़ में पीछे छोड़ दिया.” वो लड़का अपने दोस्त से कह रहा था.
“लेकिन वो है कौन?” दुसरे लड़के ने पूछा.
“अरे तुम उनको नहीं जानते? वो इस जिले के ‘डी.एम.’
है. आज अपनी पढाई के बल पर इस मुकाम पर पहुंचे है.” उस लड़के ने कहा.
ईश्वर ये बातें सुन रहा था, और उत्सुकतावश वो भी व्यायाम
करना छोड़कर ‘डी.एम.’ साहब की तरफ देखने लगा. “वो बिलकुल हमारे जैसे ही तो है बल्कि
एक पैर से थोड़े विकलांग ही है. फिर भी आज उस मुकाम पर है जहाँ पहुँचने का लाखो लोग
सपना देखते है.” ईश्वर सोचने लगा. “पर मेरे पास तो सब कुछ है, पढाई में होशियारी, पढने
के लिए समय और घर-परिवार का सहारा, सब-कुछ.” ईश्वर ‘डी.एम.’ साहब की तरफ देखता
रहा, पर उसके मन में एक उधेड़बुन चलनी शुरू हो गयी थी.
‘डी.एम.’ साहब ने अपनी दौड़ पूरी कर ली थी और वो
लोग जो शरीर से सही-सलामत थे, डी.एम. साहब को पीछे नहीं कर पाए थे. मैदान के
किनारे बैठे लोंगो ने डी.एम. साहब के लिए तालियाँ बजानी शुरू कर दी थी. जैसे की लोग
ओलंपिक दौड़ में ‘उसैन बोल्ट’ के लिए तालियाँ बजा रहे हो.
“उनके दौड़ने में ऐसी क्या खास बात है जो मेरे
दौड़ने में नहीं थी? दौड़ा तो मैं भी था?” ईश्वर सोचे जा रहा था की उसे अहसास हुआ की
लोग तालियाँ क्यों बजा रहे थे? “आज वो जिस मुकाम पर है, अपने-आप में एक हस्ती है.
लोग उनकी दौड़ के लिए तालियाँ नहीं बजा रहे थे, बल्कि लोग उनकी हस्ती को सलाम कर
रहे थे.”
“एक दिन मेरे लिए भी, लोग ऐसे ही तालियां बजायेंगे.”
ईश्वर ने अनायास ही सोचा. और उसे यह महसूस हुआ की उसे उसकी ‘प्रेरणा’ मिल चुकी थी,
की ‘उसे इस जिंदगी में क्या करना है? क्या बनना है?’ ईश्वर अपना व्यायाम पूरा कर चुका
था और उसने घर की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए.......
जितेन्द्र गुप्ता
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